Edited By ,Updated: 28 Feb, 2025 05:43 AM
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भारत के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस बी.आर. गवई निकट भविष्य में कुछ समय के लिए मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर आसीन होंगे। गवई महाराष्ट्र के विदर्भ जिले से आने वाला एक प्रसिद्ध और सम्मानित परिवार है। गवई आर.पी.आई. (रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया) में प्रमुख...
भारत के सर्वोच्च न्यायालय के जस्टिस बी.आर. गवई निकट भविष्य में कुछ समय के लिए मुख्य न्यायाधीश की कुर्सी पर आसीन होंगे। गवई महाराष्ट्र के विदर्भ जिले से आने वाला एक प्रसिद्ध और सम्मानित परिवार है। गवई आर.पी.आई. (रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया) में प्रमुख थे। जब पार्टी दो गुटों में विभाजित हो गई तो एक गुट का नेतृत्व इस परिवार ने किया। इस पृष्ठभूमि के प्रकाश में जस्टिस गवई को गरीबों और वंचितों का दुश्मन मानना मुश्किल है। रिपब्लिकन पार्टी डा. आंबेडकर के अनुयायियों की पार्टी थी। बॉम्बे (अब मुंबई)में एक युवा छात्र के रूप में मुझे याद है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आर.पी.आई. उम्मीदवारों के समर्थन में आर.पी.आई.समर्थकों को ले जाने वाले कई खुले ट्रक मेरे बायकुला स्थित घर के पास से गुजरते थे।
फिर भी, संविधान आचरण समूह (सी.सी.जी.) में अपने मित्रों और सहकर्मियों के साथ मैंने न्यायमूर्ति गवई को अपने द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र भेजा जिसमें हमने अपनी सामूहिक निराशा व्यक्त की क्योंकि उन्होंने इस वर्ष 12 फरवरी को एक सिविल रिट याचिका की सुनवाई करते हुए बेघर लोगों के लिए ‘परजीवी’ शब्द का इस्तेमाल किया था जिसमें उनके लिए पर्याप्त आश्रय सुविधाओं का अनुरोध किया गया था। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गवई ने निम्नलिखित मौखिक टिप्पणी की। दुर्भाग्य से, इन लोगों को मुख्यधारा के समाज का हिस्सा न बनाकर क्या हम परजीवियों का एक वर्ग नहीं बना रहे हैं? चुनाव घोषित होने पर मुफ्त सुविधाओं के कारण लोग काम करने को तैयार नहीं होते हैं। उन्हें बिना कोई काम किए मुफ्त राशन मिल रहा है। क्या उन्हें मुख्यधारा के समाज का हिस्सा बनाना बेहतर नहीं होगा ताकि वे राष्ट्र के लिए योगदान दे सकें।
रोमानिया जैसे कम्युनिस्ट देश में, जहां मैं 4 साल तक रहा, कुसेस्कु शासन ने अपने सभी नागरिकों के बीच गरीबी फैला दी थी। हर किसी को उसकी क्षमता के अनुसार नौकरी दी जाती थी और न्यूनतम वेतन दिया जाता था जो भोजन, कपड़े और आवास पर होने वाले खर्चों को पूरा करता था। बेशक नोमेनक्लातुरा और सरकारी अधिकारियों को उपलब्ध कराए गए आवास के स्तर में अंतर था।उस व्यवस्था को अधिकांश आबादी ने पसंद नहीं किया। इस तरह के आदेश केवल कम्युनिस्ट शासन में प्रचलित शासन के नियमित रूप में ही लागू किए जा सकते थे। मुझे नहीं लगता कि जस्टिस गवई हमारी बेरोजगारी और गरीबी की समस्या के लिए इस तरह के समाधान के बारे में सोच रहे थे। अच्छे जज की टिप्पणियों पर अधिकांश टिप्पणियां उनके द्वारा ‘परजीवी’ शब्द के इस्तेमाल पर केंद्रित थीं। जस्टिस गवई ने गलत शब्द चुना और मुझे यकीन है कि उन्हें अब तक यह एहसास हो गया होगा। उनके असली विलाप का अंदाजा उनके बाद के ‘चुनावों से ठीक पहले घोषित मुफ्त उपहारों’ के बारे में उनके तीखे कटाक्ष से लगाया जा सकता है जो रिश्वत का एक ऐसा रूप है जिसे भारत में तेजी से जीवन के एक तथ्य के रूप में स्वीकार किया जा रहा है! ठीक वैसे ही जैसे आज के समय में भ्रष्टाचार को स्वीकार कर लिया गया है!
यहां तक कि अमरीका जैसे उन्नत लोकतंत्रों में भी कूपन या सामाजिक सुरक्षा कवर के अन्य रूपों का उपयोग किया जाता रहा है। यहां तक कि अवैध आप्रवासियों को भी भूखा या ठंड से मरने के लिए नहीं छोड़ा जाता है। उन्हें निर्वासित किए जाने तक रहने और खिलाने की व्यवस्था की जाती है। हमारे देश में समस्या यह है कि गरीब और बेरोजगार इतने अधिक हैं कि उनकी गिनती नहीं की जा सकती। दिल्ली जैसे शहरों में बेघरों के लिए आश्रय की व्यवस्था बहुत जरूरी है, खासकर सॢदयों के महीनों में जब तापमान शून्य के करीब पहुंच जाता है। मैं यह मानने से इंकार करता हूं कि न्यायमूॢत गवई हमारे देश के उन पुरुषों और महिलाओं की दुर्दशा के प्रति उदासीन हैं, जिन्हें गरीबी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर किया गया है। खुली अदालत में की गई उनकी टिप्पणियों को पढ़कर मुझे लगता है कि उनकी नाराजगी उन लोगों के प्रति थी जो आॢथक गतिविधियों को ऐसी दिशा में ले जाने की स्थिति में हैं, जिससे भारत के अधिकांश निवासियों के लिए रोजगार की संभावनाएं खुलें और वे हमारी प्रगति में योगदान दे सकें।
यह एक कठिन काम है लेकिन इस बात के संकेत चाहिएं कि सरकार इस समस्या से निपटने के लिए उत्सुक है। फिलहाल, हमें ऐसे कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। इसका पूरा ध्यान चुनाव जीतने पर केंद्रित है। मेरे मित्र अवय शुक्ला हिमाचल प्रदेश कैडर के पूर्व आई.ए.एस. अधिकारी थे। मैं उनसे व्यक्तिगत रूप से नहीं मिला हूं लेकिन मैं हर हफ्ते उनके ब्लॉग पढ़ता हूं। उन्हें पढऩा आनंददायक है, न केवल भाषा की सहजता के कारण बल्कि उन लोगों पर सूक्ष्म रूप से कटाक्ष करने के कारण भी जिन्हें उकसाने की जरूरत है। न्यायमूर्ति गवई द्वारा ‘परजीवी’ शब्द के इस्तेमाल पर उनका विचार जायज है। लेकिन एक अच्छे न्यायाधीश को सिर्फ एक ‘जीभ की फिसलन’ के आधार पर आंका नहीं जाना चाहिए और न ही उसकी निंदा की जानी चाहिए। उन्होंने पहले भी कुछ अच्छे फैसले दिए हैं, लेकिन मानवीय स्वभाव के कारण हम सिर्फ एक अस्वीकार्य गलती को ही पिं्रट में उनकी निंदा करने के लिए चुन लेते हैं।-जूलियो रिबैरो(पूर्व डी.जी.पी. पंजाब व पूर्व आई.पी.एस. अधिकारी)