हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया

Edited By ,Updated: 03 Dec, 2024 05:40 AM

i blew away every worry into smoke

आज मुम्बई फिल्म उद्योग अरबों रुपयों का व्यापार कर रहा है, परंतु 1913 में दादा साहिब फाल्के ने मूक फिल्म बनाई थी तो उस पर कुल खर्च 15,000 रुपए आया था। तब 15000 रुपए बहुत बड़ी राशि हुआ करती थी। हां तो मैं बात कर रहा हूं भारत में पहली मूक फिल्म ‘राजा...

आज मुम्बई फिल्म उद्योग अरबों रुपयों का व्यापार कर रहा है, परंतु 1913 में दादा साहिब फाल्के ने मूक फिल्म बनाई थी तो उस पर कुल खर्च 15,000 रुपए आया था। तब 15000 रुपए बहुत बड़ी राशि हुआ करती थी। हां तो मैं बात कर रहा हूं भारत में पहली मूक फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ की। इस फिल्म को देखने वालों की भीड़ लग गई। दादा साहिब फाल्के ने खूब पैसा कमाया। फिर दादा साहिब फाल्के ने 1931 में भारत में पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ बनाई जिसका अर्थ है ‘विश्व रोशनी’। अभिनय की त्रिमूर्ति दलीप कुमार, राजकपूर और देवानंद अनोखे अदाकार थे। अशोक कुमार इन तीनों से बड़े और अपने अभिनय स्टाइल में इनके गुरु माने जाते थे। 

आज तीन दिसम्बर सिनेजगत के सदाबहार हीरो देवानंद की पुण्यतिथि है जिनका देहांत 9 दिसम्बर 2011 को इंगलैंड में दिल का दौरा पडऩे से हो गया । जहां दलीप कुमार धोती-कुर्ता पहने दर्शकों की तालियां बटोर लेते थे, वहीं राजकपूर अपनी नायिका के प्रत्येक अंग पर कैमरा घुमाते हुए पर्दा स्क्रीन से दर्शकों को अपनी ओर खींच लेते थे चाहे  ‘राम तेरी गंगा मैली’ की नायिका मंदाकिनी हो या फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ की नायिका जीनत अमान या फिल्म ‘बॉबी’ की नायिका डिम्पल कपाडिया  या फिल्म ‘जिस देश में गंगा बहती है’ या फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ की नायिका पद्मिनी हो। राजकपूर अपनी नायिका के अंग-अंग को दर्शकों को दिखाते जाते परंतु स्वयं जोकर ही बने रहते। वहीं देवानंद अपनी फिल्मों में बागों में वृक्षों की टाहनियों, पक्षियों में अपनी हीरोइन से खेलते और पाश्र्व में गीतों की मधुर लय से सिनप्रेमियों को आनंदित कर देते। तीनों हीरो अभिनय की अपनी-अपनी शैली में निपुण थे। दलीप स्वयं भी रोते और दर्शकों को भी रुलाते। इसीलिए उन्हें अभिनय सम्राट और ‘ट्रैजडी किंग’ के रूप से नवाजा गया है। 

राजकपूर अपनी परियों जैसी नायिकाओं को दिल में बसाए, पर्दा स्क्रीन पर दर्शकों को मोह लेते थे। दुनिया का कोई भी फिल्म आलोचक यह नहीं मानेगा कि फिल्म ‘जब प्यार किसी से होता है’ का नायक 1965 में आई अपनी फिल्म ‘गाइड’ का साधु एक ही अभिनेता है। फिल्म ‘हम दोनों’ की दोहरी भूमिका निभाने वाला मेजर आनंद वही देवानंद है जो एक सैनिक की भूमिका में मस्ती से गाता जाता है ‘मैं जिंदगी का साथ निभाता चला गया, हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया।’देवानंद जहां एक बेहतर एक्टर थे वहीं वह बेहतरीन व्यक्तित्व के भी मालिक थे। हमेशा फिल्में बनाते जाना। फिल्मों द्वारा नए-नए प्रयोग करते जाना देवानंद का स्वभाव था। केवल 30 रुपए जेब में डाले, बम्बई नगरी में अपना स्थान बना लेना यह देव साहिब का भाग्य ही कहा जाएगा। 30 रुपए से 350 करोड़ का घर बना लेना यह देव साहिब का ही काम था। बम्बई जैसे शहर में टिके रहना और उस जमाने की सुपरस्टार अभिनेत्री सुरैया के दिल पर छा जाना उनकी किस्मत ही होगी। देव साहिब और सुरैया दोनों शादी करने वाले थे कि सुरैया की नानी ने अपने मजहब की दीवार खड़ी कर दी। 

नानी की शर्त यह थी कि देवानंद मुसलमान धर्म अपना लें परंतु देवानंद ने हिन्दू धर्म छोडऩे से साफ इंकार कर दिया। शादी होते-होते रह गई। तब देवानंद अपने बड़े भाई चेतनानंद के कंधे पर सिर रखकर खूब रोए। चेतनानंद ने उन्हें बहुत साहस दिया। देवानंद ने सुरैया द्वारा दी गई डायमंड की अंगूठी समुद्र में फैंक दी और फिर कभी सुरैया का नाम नहीं लिया और न कभी दोबारा सुरैया से मिले। सुरैया ने भी देवानंद की खातिर तमाम उम्र शादी नहीं की और दर्शक जानते भी होंगे कि सुरैया के जीवन के अंतिम क्षण अवसाद में गुजरे और उनकी मौत तन्हाई में हुई। ऐसे प्यार को सलाम। उन्होंने अपने 60 साल के फिल्मी जीवन में 100-150 फिल्में की होंगी। वह विश्व प्रसिद्ध अभिनेता कहलाए। फिल्म ‘काला बाजार’ के लिए उन्हें बैस्ट अभिनेता का पुरस्कार भी मिला। भारत सरकार ने देवानंद को पद्मश्री से अलंकृत किया। देश में कला क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार ने ‘दादा साहिब फाल्के’ जैसे सर्वोच्च सम्मान से भी नवाजा। ‘गाइड’ फिल्म देवानंद के करियर की बैस्ट फिल्म थी जिसने अनेकों राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त किए। अभिनेता देवानंद का परिवार देश की आजादी का भी दीवाना था। देश को आजाद करवाने के लिए वह कई बार जेल भी गए। 

आजादी के बाद 1952 में उनके सबसे बड़े भाई मनमोहन आनंद ने गुरदासपुर से विधानसभा का चुनाव जनसंघ की टिकट पर लड़ा था और उन्हें 2500 वोट प्राप्त हुए थे। 1977 में उन्होंने श्रीमती इंदिरा गांधी के  खिलाफ राजनीतिक दल नैशनल पार्टी आफ इंडिया बनाई थी। यह देवानंद ही थे जो जीनत अमान, टीना मुनीम, शत्रुघ्न सिन्हा जैसे कई अभिनेता-अभिनेत्रियों को फिल्मी पर्दे पर लाए। आज तीन दिसम्बर को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि।-मा. मोहन लाल (पूर्व परिवहन मंत्री, पंजाब)

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