पाकिस्तान के नेताओं को‘श्री वाजपेयी की ऐतिहासिक लाहौर यात्रा की याद आई’ ‘भारत के पक्ष में उठने लगीं आवाजें’

Edited By ,Updated: 26 Dec, 2024 05:25 AM

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पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जब देखा कि भारत के विरुद्ध सारे हथकंडे आजमा कर भी पाकिस्तान कुछ हासिल नहीं कर सका तो उन्होंने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर आमंत्रित किया था।

पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने जब देखा कि भारत के विरुद्ध सारे हथकंडे आजमा कर भी पाकिस्तान कुछ हासिल नहीं कर सका तो उन्होंने भारत की ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाहौर आमंत्रित किया था। नवाज शरीफ के निमंत्रण पर श्री अटल बिहारी वाजपेयी 19 फरवरी, 1999 को बस द्वारा लाहौर गए। वहां ऐतिहासिक शिखर सम्मेलन के बाद उन्होंने तथा नवाज शरीफ ने आपसी मैत्री और शांति के लिए 21 फरवरी, 1999 को ऐतिहासिक ‘लाहौर घोषणा पत्र’ पर हस्ताक्षर किए थे।

इस समझौते ने दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य करने की दिशा में एक बड़ी सफलता का संकेत दिया था और आशा बंधी थी कि इस क्षेत्र में शांति का नया अध्याय शुरू होगा। परंतु इसके कुछ महीनों बाद ही मई, 1999 में पाकिस्तानी घुसपैठ के कारण कारगिल युद्ध शुरू हो गया। कारगिल युद्ध का विरोध करने तथा हारने के बाद भारत के साथ बेहतर संबंधों का पक्ष लेने के कारण नवाज शरीफ को तत्कालीन सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ ने सन 2000 में सत्ताच्युत करके देश निकाला दे दिया तथा इसके परिणामस्वरूप भारत और पाकिस्तान के बीच संबंधों को बेहतर बनाने का मौका दोनों देशों के हाथ से निकल गया। 

25 दिसम्बर, 2024 को स्व. अटल बिहारी वाजपेयी की 100वीं जयंती के उपलक्ष्य में लाहौर में पत्रकारों ने कुछ वरिष्ठï राजनीतिज्ञों से बात की। देश की सत्तारूढ़ पार्टी ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज’ (पी.एम.एल.-एन.) के वरिष्ठï नेता और पंजाब असैम्बली के अध्यक्ष ‘मलिक अहमद खान’ ने कहा :

‘‘अटल बिहारी वाजपेयी की वह बस यात्रा दोनों देशों के संबंधों को शांति के मार्ग पर लाने का एक साहसिक प्रयास था। भले ही हम मौका चूक गए हों लेकिन हमें फिर से प्रयास करना चाहिए।’’
‘‘प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो वाजपेयी के दृष्टिïकोण का अनुसरण करते हैं, वह भारत का नेतृत्व कर रहे हैं और नवाज शरीफ के भाई शहबाज शरीफ पाकिस्तान में प्रधानमंत्री हैं। लिहाजा दोनों देशों के बीच शांति प्रक्रिया को फिर से शुरू करने की प्रबल संभावना है।’’

‘‘इस क्षेत्र का भविष्य मुक्त व्यापार और दोनों देशों के बीच बिना बाधा आवागमन पर निर्भर करता है। यह इस क्षेत्र में शांति केवल एक अच्छा विचार ही नहीं बल्कि विकास और समृद्धि के लिए आवश्यक है।’’
पार्टी के एक अन्य नेता ‘मोहम्मद मेहदी’ ने श्री वाजपेयी की यात्रा को ऐतिहासिक बताते हुए कहा,‘‘यदि कारगिल युद्ध नहीं हुआ होता तो श्री वाजपेयी की वह यात्रा इस क्षेत्र को स्थायी शांति की ओर ले जा सकती थी।’’ 
‘मोहम्मद मेहदी’ के अनुसार, ‘‘फरवरी, 1999 में जब वाजपेयी लाहौर पहुंचे तो विशेष रूप से पी.एम.एल.-एन. के कार्यकत्र्ताओं में उत्साह था। श्री वाजपेयी ने अपने भाषण में कहा था कि पाकिस्तान एक वास्तविकता है और दोनों देशों को अब आगे बढऩे तथा अतीत को पीछे छोडऩे की जरूरत है। इससे कई लोगों में उम्मीद जागी थी।’’

‘‘इस समय दोनों देशों के बीच संबंध सबसे खराब स्थिति में हैं। दोनों देशों में से किसी भी देश का एक-दूसरे की राजधानी में कोई राजदूत नहीं है। हालांकि दोनों पक्षों के व्यापारी व्यापार में सुधार के लिए संबंधों को बहाल करना चाहते हैं।’’
एक अन्य राजनीतिक विशेषज्ञ ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) ‘फारूक हमीद’ का कहना है कि ‘‘वह पहल विफल हो गई क्योंकि सेना से परामर्श नहीं किया गया। इसी कारण कारगिल संघर्ष हुआ और शांति प्रक्रिया समाप्त हो गई। यदि नवाज शरीफ ने वाजपेयी की यात्रा से पहले सेना को शामिल कर लिया होता तो शांति वार्ता सफल होने की अधिक संभावना होती।’’

पाकिस्तान के उक्त नेताओं के बयानों से स्पष्टï है कि अभी भी पाकिस्तान में राजनीतिज्ञों का एक बड़ा वर्ग दोनों देशों के बीच शांति और सौहार्द का समर्थक है और उसका मानना है कि इसी में उनका भला है। इससे भारतीय पंजाब की अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी और यहां पाक प्रायोजित हिंसा समाप्त होने से शांति कायम होगी, परंतु अधिक लाभ में तो कंगाली के कगार पर पहुंच चुका पाकिस्तान ही रहेगा। अत: ये नेता अपने आकाओं को यह बात जितनी जल्दी समझा सकेंगे, पाकिस्तान के भविष्य के लिए उतना ही अच्छा होगा।—विजय कुमार  

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