असली मुद्दा न्यायिक व्यवस्था की पारदर्शिता और जवाबदेही का है

Edited By ,Updated: 26 Mar, 2025 05:26 AM

the real issue is the transparency and accountability of the judicial

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के मामले में असली खतरा यह नहीं है कि इस मामले में कुछ कार्रवाई नहीं होगी। इतने बड़े खुलासे के बाद और अब तक सुप्रीम कोर्ट का रुख देखकर ऐसा लगता है कि इस मामले में ठीक-ठाक जांच होगी।

दिल्ली हाई कोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा के मामले में असली खतरा यह नहीं है कि इस मामले में कुछ कार्रवाई नहीं होगी। इतने बड़े खुलासे के बाद और अब तक सुप्रीम कोर्ट का रुख देखकर ऐसा लगता है कि इस मामले में ठीक-ठाक जांच होगी। और अगर जांच में कुछ निकला तो सिर्फ ट्रांसफर जैसी बैंड-एड लगाने की बजाय, कुछ गंभीर कार्रवाई की उम्मीद भी है। असली खतरा यह है कि न्यायिक भ्रष्टाचार का ठीकरा एक जज पर फोड़कर इस गहरी संस्थागत बीमारी से आंख मूंद ली जाएगी। उससे भी बड़ा खतरा यह है कि एक जज के बहाने सभी अदालतों को बदनाम कर न्यायपालिका की बची-खुची स्वतंत्रता भी खत्म कर दी जाएगी। इलाज के नाम पर मरीज की हत्या हो जाएगी।

कोर्ट-कचहरी के कामकाज के जानकार लोगों के लिए यह कांड कोई नई बात नहीं थी। नया सिर्फ इतना था कि दैवीय प्रकोप के चलते अचानक बात कुछ इस तरह सार्वजनिक हो गई कि उसे छुपाना-दबाना नामुमकिन हो गया। नहीं तो नीचे से ऊपर तक अदालतों के गलियारों में भ्रष्टाचार की कहानियां हर रोज सुनने को मिलती हैं। संभव है कि ये कहानियां द्वेष से प्रेरित हों, लेकिन सार्वजनिक सूचना के अभाव में इन अफवाहों को बल मिलता है। जब प्रशांत भूषण ने 2022 में अपने विरुद्ध अदालत की अवमानना के मुकद्दमे में हलफनामा दाखिल कर सुप्रीम कोर्ट के 8 मुख्य न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के प्रमाण दिए थे, तो उन आरोपों की जांच करने की बजाय अदालत ने मामले को दबा दिया। दुर्भाग्यवश जब-जब न्यायपालिका से जुड़े संवेदनशील मुद्दे उठते हैं, तब-तब कुछ ऐसा ही होता है। 

इस बार यही कहानी न दोहराई जाए, इसके लिए कम से कम चार बड़े मुद्दों पर गौर करना होगा, जिन्हें कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाऊंटेबिलिटी एंड ज्यूडिशियल रिफार्म (यानी न्यायिक जवाबदेही और न्यायिक सुधार अभियान) पिछले दस साल से उठा रहा है। पहला मुद्दा तो सीधे इस नवीनतम केस से जुड़ा है - न्यायाधीशों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच और सुनवाई इस तरह से हो, जिससे आमजन की न्यायपालिका में आस्था बनी रहे। इस नवीनतम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पारदर्शिता का एक नमूना पेश किया है। यह खबर सार्वजनिक होने के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने इस मामले से संबंधित सारे कागजात सार्वजनिक कर दिए, सिवाय कुछ नामों और सूचनाओं के, जिनके सार्वजनिक होने से मामले की जांच में मुश्किल आ सकती थी। तीन हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को जांच का काम सौंप दिया गया है। जांच पूरी होने तक न्यायाधीश वर्मा को कोई भी न्यायिक काम देने से रोक लगा दी गई है। उम्मीद है जांच की रिपोर्ट को भी सार्वजनिक कर दिया जाएगा। फैसला जो भी हो, किसी के मन में शक की गुंजाइश नहीं रहेगी।

सवाल यह है कि ऐसा हर गंभीर मामले में क्यों नहीं किया जा सकता? दुर्भाग्यवश पिछले अनेक वर्षों से इसका ठीक उलटा हुआ है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई तो ख़ुद अपने विरुद्ध यौन प्रताडऩा के मामले में इंसाफ करने बैठ गए थे। बाद में जब जांच समिति बनी भी तो उसकी रिपोर्ट तक शिकायतकत्र्ता को नहीं दी गई। अधिकांश मामलों में तो पता ही नहीं चलता कि कोई जांच हुई भी या नहीं, हुई तो क्या नतीजा निकला। इससे यही संदेह गहरा होता है कि मामलों को रफा-दफा कर दिया जाता है। इसलिए यह नियम बनाना चाहिए कि हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के किसी भी न्यायाधीश के खिलाफ कोई भी व्यक्ति अगर अपना नाम और प्रमाण देकर कोई गंभीर आरोप लगाता है तो कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि उस पर इंटरनल समिति बनाए, आरोपों की जांच करे, उस पर लिखित फैसला दे और अपने फैसले को (पर्याप्त सावधानी सहित) सार्वजनिक करे।

दूसरा मुद्दा जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता का है। हमारे यहां जजों की नियुक्ति का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों के कॉलेजियम ने अपने हाथ में ले रखा है। ऐसे में कोर्ट की जिम्मेदारी बनती है कि इस संवेदनशील फैसले के बारे में उंगली उठाने की गुंजाइश न बचे। लेकिन दुर्भाग्यवश कोर्ट द्वारा चुने गए जजों को लेकर अनेक सवाल उठे हैं। भाई-भतीजावाद और जातिवाद से लेकर लैंगिक पूर्वाग्रह और राजनीतिक दबाव तक के आरोप लगे हैं। संभव है कि अधिकांश आरोप निराधार हों, लेकिन सार्वजनिक चर्चा में उनका खंडन करने का आधार नहीं मिलता। इसलिए कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाऊंटेबिलिटी एंड ज्यूडिशियल रिफार्म ने मांग की है कि जहां तक हो सके, नियुक्ति से जुड़े सारे कागज सार्वजनिक कर दिए जाएं - किन नामों पर विचार हुआ, क्या आपत्तियां मिलीं और कॉलेजियम के फैसले का आधार क्या था? पिछले कुछ सालों से केंद्र सरकार अपनी मनमर्जी से कोर्ट द्वारा नियुक्ति की किसी सिफारिश को मान लेती है, किसी को टाल देती है, किसी को खारिज कर देती है। इसकी मर्यादा बनाना भी जरूरी है।

तीसरा मुद्दा कोर्ट के रोस्टर की मर्यादा बांधने का है। न्यायपालिका के काम से वाकिफ हर व्यक्ति जानता है कि केस का फैसला बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि वह केस किन जजों की बैंच के सामने लगेगा और कब। और यह फैसला पूरी तरह से मुख्य न्यायाधीश के हाथ में है, चूंकि वह ‘मास्टर ऑफ रोस्टर’ है। मतलब यह कि मुख्य न्यायाधीश किसी भी केस के भाग्यविधाता हैं -केस कितने साल तक लटकेगा, कब लगेगा, किस रुझान वाले जज या बैंच के सामने लगेगा, सब कुछ। इस अधिकार के दुरुपयोग की शिकायत बहुत आम है, खासतौर पर उन मामलों में, जिनमें सरकार, बड़े राजनेता या बड़े बिजनैस का स्वार्थ जुड़ा हो। दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में सालों तक जमानत की अर्जी पर फैसला नहीं हुआ। कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल एकाऊंटेबिलिटी एंड ज्यूडिशियल रिफॉर्म ने मांग की है कि यह शक्ति केवल मुख्य न्यायाधीश की बजाय वरिष्ठ न्यायाधीशों के कॉलेजियम को दी जाए, कौन जज किस विषय से जुड़े मामले सुनेंगे, यह पहले से तय हो, फिर बैंच का आबंटन लाटरी से हो, हर केस समय से लगे और जल्दी सुनवाई की अर्जी का खुले कोर्ट में फैसला हो।

चौथा और अंतिम मुद्दा जजों की संपत्ति की जानकारी सार्वजनिक करने का है। विडंबना यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनेताओं के लिए अपने नामांकन पत्र में अपनी आय और संपत्ति की घोषणा करना अनिवार्य बनाया, अब यह घोषणा सरकारी अफसरों के लिए भी अनिवार्य हो गई है। लेकिन यह बंदिश सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों पर लागू नहीं होती। जाहिर है, इसे बदलना होगा। बाकी सबके लिए मर्यादा लागू करने वाली न्यायपालिका को खुद मर्यादा के सर्वोच्च प्रतिमान बनाने होंगे।-योगेन्द्र यादव
 

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