Edited By Niyati Bhandari,Updated: 16 May, 2022 10:50 AM
श्री रामचरित मानस के उत्तरकांड में काक भुशुंडि जी अपना अनुभव बता रहे हैं : निज अनुभव अब कहऊं खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा।
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Bhagwan ki Bhakti kaise kare: श्री रामचरित मानस के उत्तरकांड में काक भुशुंडि जी अपना अनुभव बता रहे हैं : निज अनुभव अब कहऊं खगेसा। बिनु हरि भजन न जाहिं कलेसा।
अर्थात क्लेशों से मुक्ति एवं सच्ची सुख-शांति हरि भजन के अतिरिक्त किसी प्रकार नहीं मिल सकती लेकिन हरि भजन अर्थात हरि भक्ति तभी सुख-शांति प्रदान करती है जब उसे धारण किया जाए।
भक्ति तो करें नहीं और उसकी चर्चा करें तो सुख-शांति नहीं मिलती। अत: समझें कि भक्ति हमारे व्यवहार में कैसे उतरे। भगवान को चंदन, पुष्प अर्पण करना मात्र इतने में कोई भक्ति पूर्ण नहीं होती, यह तो भक्ति की एक प्रक्रिया मात्र है। भक्ति तो तब ही होती है जब सब में भक्तिभाव जागता है।
ईश्वर सब में है। मैं जो कुछ भी करता हूं उस सबको ईश्वर देखते हैं, जो ऐसा अनुभव करता है उसको कभी पाप नहीं लगता। उसका प्रत्येक व्यवहार उचित है और यही तो भक्ति है। जिसके व्यवहार में दंभ है, अभिमान है, कपट है, उसका व्यवहार शुद्ध नहीं जिसका व्यवहार शुद्ध नहीं उसे भक्ति में आनंद आता नहीं।
मानव भक्ति करता है परंतु व्यवहार शुद्ध नहीं रखता। जिसका व्यवहार शुद्ध नहीं वह मंदिर में भी भक्ति नहीं कर सकता। जिसका व्यवहार शुद्ध है वह जहां बैठा है, वहीं भक्ति करता है और वहीं उसका मंदिर है। व्यवहार और भक्ति में बहुत अंतर नहीं है।
रास्ता चलते, गाड़ी में यात्रा करते अथवा दुकान में बैठकर धंधा करते सर्वकाल में और सर्वस्थल में सतत् भक्ति करनी है। भक्त बाजार में शाक-भाजी लेने जाए, यह भी भक्ति है। उसका ऐसा भाव है कि मैं अपने ठाकुर जी के लिए शाक-भाजी लेने जाता हूं। प्रत्येक कार्य में ईश्वर का अनुसंधान हो इसे ही भक्ति कहते हैं।
प्रभु का स्मरण करते-करते घर का काम करो तो वह भी भक्ति है। यह घर ठाकुर जी का है। घर में कचरा रहेगा तो ठाकुर जी नाराज होंगे। ऐसा मान कर झाड़ू देना भी भक्ति है। मेरे प्रभु हृदय में विराजमान हैं और उन्हें भूख लगी है, ऐसी भावना से किया भोजन भी भक्ति है।
बहुत-सी माताओं को ऐसा लगता है कि कुटुम्ब बहुत बड़ा है जिससे सारा दिन रसोईघर में ही चला जाता है, सेवा-पूजा कुछ हो नहीं पाती परंतु घर में सबकी सेवा भी भक्ति है। भक्ति करने के लिए घर छोड़ने या व्यापार छोड़ने की आवश्यकता नहीं। केवल अपने लिए ही कार्य करो, यह पाप है। घर के मनुष्यों के लिए काम करो, यह व्यवहार है और परमात्मा के लिए काम करो यह भक्ति है।
कार्य तो एक ही है परंतु इसके पीछे रही भावना में बहुत फर्क है। महत्व क्रिया का नहीं, क्रिया के पीछे भावना क्या है यह महत्वपूर्ण है। मंदिर में एक मनुष्य बैठा-बैठा माला फेरे परंतु विचार संसार का करे, दूसरा मनुष्य प्रभु का स्मरण करते-करते बुहारी करे तो उस माला जपने वाले से यह बुहारी करने वाला श्रेष्ठ है। अपनी दिनचर्या की सब क्रियाओं को भगवान से जोड़ दें। हम स्नान क्यों कर रहे हैं? शरीर को स्वच्छ करने के लिए क्योंकि हमें भजन करने के लिए भगवान के पास बैठना है। हमारे पसीने की दुर्गंध भगवान को न आ जाए, इस भावना से स्नान करना भी भक्ति हो गया।
हमें कोई रोग लग गया, उसका उपचार करा लें क्यों ? क्योंकि हम निरोग हो जाएंगे तो भगवान का भजन अच्छे से कर पाएंगे, इस भावना से रोग का उपचार करना भी भक्ति बन गया। अत: अपने शरीर और मन की सब क्रियाओं को भगवान से जोड़ दें। इस प्रकार हमारी दिनचर्या की सब क्रियाएं भक्तिमय हो जाएंगी।