Edited By Jyoti,Updated: 22 Nov, 2022 05:40 PM
एक महात्मा ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तप कर रहे थे। उन्होंने अपने शरीर को काफी कष्ट दिया, घने जंगलों में कड़ी साधना की पर आत्म-ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन निराश होकर वह सोचने लगे-मैंने अभी तक कुछ भी प्राप्त नहीं किया अब आगे क्या कर पाऊंगा?
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एक महात्मा ज्ञान प्राप्ति के लिए घोर तप कर रहे थे। उन्होंने अपने शरीर को काफी कष्ट दिया, घने जंगलों में कड़ी साधना की पर आत्म-ज्ञान की प्राप्ति नहीं हुई। एक दिन निराश होकर वह सोचने लगे-मैंने अभी तक कुछ भी प्राप्त नहीं किया अब आगे क्या कर पाऊंगा?
निराशा और अविश्वास के इन नकारात्मक भावों ने उन्हें क्षुब्ध कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद उन्हें प्यास लगी। वह थोड़ी दूर स्थित एक झील पर पहुंचे। वहां उन्होंने एक दृश्य देखा कि एक नन्हीं-सी गिलहरी के 2 बच्चे झील में डूब रहे थे। पहले तो गिलहरी बैठी रही, फिर कुछ देर बाद उठकर वह झील के पास गई। अपना सारा शरीर झील के पानी में भिगोया और फिर बाहर आकर पानी झाड़ने लगी। ऐसा वह बार-बार करने लगी।
महात्मा सोचने लगे, ‘‘इस गिलहरी का प्रयास कितना मूर्खतापूर्ण है, क्या कभी यह इस झील को सुखा सकेगी?
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किंतु गिलहरी का प्रयास लगातार जारी रहा। महात्मा को लगा मानो गिलहरी कह रही हो कि यह झील कभी खाली होगी या नहीं यह मैं नहीं जानती किंतु मैं अपना प्रयास नहीं छोड़ूंगी।
अंतत: उस छोटी-सी गिलहरी ने महात्मा को अपने लक्ष्य-मार्ग से विचलित होने से बचा लिया। वह सोचने लगे कि जब यह नन्हीं गिलहरी अपने लघु सामर्थ्य से झील को सुखा देने के लिए दृढ़ संकल्पित है तो मुझमें क्या कमी है?
मैं तो इससे हजार गुणा अधिक क्षमता रखता हूं।
यह सोचकर महात्मा ने सबसे पहले गिलहरी के बच्चों को डूबने से बचाया और पुन: अपनी साधना में लग गए तथा एक दिन उन्हें ज्ञान का दिव्य आलोक प्राप्त हुआ।