Edited By Jyoti,Updated: 29 Jun, 2019 11:17 AM
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महान संत रज्जब अली खान आमेर की सेना के मुख्य सेनापति के पुत्र थे। वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करने के लिए एक बड़ी बारात के साथ सांगानेर से आमेर जा रहे थे। सिर के ऊपर मोर मुकुट बंधा था।
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महान संत रज्जब अली खान आमेर की सेना के मुख्य सेनापति के पुत्र थे। वह अपनी पसंद की लड़की से शादी करने के लिए एक बड़ी बारात के साथ सांगानेर से आमेर जा रहे थे। सिर के ऊपर मोर मुकुट बंधा था। रास्ते में संत दादू दयाल जी का आश्रम आया। रज्जब ने दादू की सिद्धियों और साधना के किस्से बचपन से सुन रखे थे। रज्जब दादू के दर्शन करने पहुंचे। दादू समाधि में थे। जब दादू समाधि से उठे, तो रज्जब ने उन्हें प्रणाम किया।
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दादू की स्नेह से भरी दृष्टि रज्जब पर पड़ी। दादू ने रज्जब को ज्ञान दिया। उसी पल रज्जब ने दादू को गुरु मान लिया। गुरु वाणी सुनते ही रज्जब को वैराग्य हो गया। मन से मोह-माया छोड़ दी। विवाह न करने का विचार बनाया, बारात लौटा दी गई। अब रज्जब दूल्हे की पोशाक उतारने लगे, तभी दादू बोले-जिस पोशाक में तुमने सत्य को ढूंढ कर वैराग्य पाया है, उसको मत उतारना। दादू के वचन के बाद रज्जब ने आजीवन दूल्हे की पोशाक नहीं उतारी।
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संत दादू दयाल की एक दृष्टि मात्र से रज्जब आगे चलकर महान संत बन गए। जब भी शेरवानी पुरानी होकर फटने लगती, तभी कोई शिष्य नई शेरवानी सिलवा देता। संत दादू दयाल के ब्रह्मलीन होने के बाद उनके उत्तराधिकारी गरीबदास ने एक बार रज्जब को शेरवानी उतारकर दूसरे कपड़े पहनने को कहा लेकिन रज्जब ने पोशाक नहीं उतारी। लगभग 122 वर्ष की उम्र तक रज्जब भक्ति भाव में लीन रहे। राम चरण दास जी ने रज्जब के बारे में दोहा लिखा है- दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रजब सा जाण। एक शब्द में उधड़ गया, रही नहीं खेंचा ताण।
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