Edited By Jyoti,Updated: 22 Jul, 2022 02:25 PM
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अगस्त माह की 2 तारीख को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शंकर के गले के आभूषण नाग देवता की पूजा करने का विधान होता है। जिन लोगों को सर्प भय होता है उनके लिए इस दिन नाग देवती की पूजा करना बेहद लाभदायक माना जाता...
शास्त्रों की बात, जानें धर्म के साथ
अगस्त माह की 2 तारीख को नाग पंचमी का पर्व मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शंकर के गले के आभूषण नाग देवता की पूजा करने का विधान होता है। जिन लोगों को सर्प भय होता है उनके लिए इस दिन नाग देवती की पूजा करना बेहद लाभदायक माना जाता है। तो वहीं इसके अलावा जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष होता है उनके लिए इस दिन रुदाभिषेक करना बेहद लाभदायक होता है। हिंदू धर्म में नाग पंचमी को अधिक महत्व प्रदान है, जिस तरह से अन्य देवी-देवताओं से जुड़े पर्व व व्रत आदि के उपलक्ष्य में पूजा आदि किया जाता है, ठीक उसी नाग देवता को प्रसन्न करने के लिए भी लोग इनका विधि वत पूजन तो करते ही हैं, साथ ही साथ इनसे जुड़ी कई तरह के उपाय भी करते हैं। आज हम आपको इस आर्टिकल में नाग पंचमी के दिन किया जाने वाला एक ऐसा ही उपाय बताने जा रहे हैं जिसे करना बेहद आसाना व लाभदायक है। जी हां, ज्योतिष व धार्मिक शास्त्रों के अनुसार इस उपाय को कोई भी व्यक्ति आसानी से करके नादग देवता की कृपा पा सकता है। तो चलिए बिना देरे किए हुए जानते हैं क्या है वो उपाय, लेकिन इससे पहले जानें नाग पंचमी तिथि का प्रारंभ व समापन-
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नाग पंचमी 2022 तिथि -
सावन नाग पंचमी तिथि प्रारम्भ: 2 अगस्त 2022, 05.14 AM
सावन नाग पंचमी तिथि समापन: 3 अगस्त 2022 05.42 AM
नाग पंचमी पूजा मुहूर्त: 2 अगस्त 2022, 05.42 AM से 8.24 AM
दरअसल हिंदू धर्म में अन्य देवी-देवताओं की तरह नाग देवता से जुड़ी चालीसा या पाठ का वर्णन भी किया गया है। कहा जाता है इस चालीसा या पाठ का जप करने से व्यक्ति की सर्प के काटने का भय नहीं सताता, और साथ ही साथ कुंडली में परेशान कर रहे कालसर्प दोष का भी हमेशा हमेशा के लिए खात्मा हो जाता है।
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यहां जानें श्री सर्प सूक्त पाठ-
ब्रह्मलोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमा: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: वासुकि प्रमुखाद्य: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा
कद्रवेयश्च ये सर्पा: मातृभक्ति परायणा ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
इन्द्रलोकेषु ये सर्पा: तक्षका प्रमुखाद्य ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
सत्यलोकेषु ये सर्पा: वासुकिना च रक्षिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
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मलये चैव ये सर्पा: कर्कोटक प्रमुखाद्य ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
पृथिव्यां चैव ये सर्पा: ये साकेत वासिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
सर्वग्रामेषु ये सर्पा: वसंतिषु संच्छिता ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
समुद्रतीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिन: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
रसातलेषु ये सर्पा: अनन्तादि महाबला: ।
नमोस्तुतेभ्य: सर्पेभ्य: सुप्रीतो मम सर्वदा ।।
इति श्री सर्प सूक्त पाठ समाप्त