Edited By Jyoti,Updated: 06 Sep, 2019 01:31 PM
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आज भाद्रपद की अष्टमी तिथि के दिन यानि सितंबर की 6 तारीख़ को देश के कई हिस्सों में राधा रानी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है।
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आज भाद्रपद की अष्टमी तिथि के दिन यानि सितंबर की 6 तारीख़ को देश के कई हिस्सों में राधा रानी के जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में राधा अष्टमी का पर्व मनाया जा रहा है। बीते दिन यानि गुरुवार को लाडली जी की नगरी राधा जन्मोत्सव की पूर्व संध्या पर बधाई गायन से गूंजी, जहां सुबह से ही भक्तों का आना जाना शुरु हो गया। हर तरफ़ हर की राधा रानी की मस्ती में झूमता दिखाई दिया। यहां न केवल लाडली मंदिर बल्कि इसके साथ पड़ने वाल बस स्टैंड, पीली कोठी तिराहा, पुराना बस स्टैंड, सुदामा चौक, मेन बाजार, रंगीली गली भव्य विद्युत सजावट से दुल्हन की तरह सजी हुई है। इतना ही नहीं जैसे ही बृषभान आंगन में लाली के जन्म की सूचना पहुंची तो नंद संग यशोदा मैया कान्हा के साथ प्रथम बधाई लेकर यहां पहुंची। लाड़ली जी के पुजारियों ने भी उनको बधाई के बदले बधाई दी। मंदिर परिसर चौक में राधारानी के समक्ष नंदगांव से आए ब्राह्मण समाज के बुजुर्ग व युवा बालकों ने भक्ति काल के रसिक कवियों के जन्म बधाई के पदों का गायन किया।
तो आइए जानते हैं लाडली मंदिर से जुड़ी कुछ खास व रोचक बातें-
मथुरा में बरसाने के बीचों-बीच एक पहाड़ी है पर एक भव्यव व खूबसूरत मंदिर स्थित है, जिसे को ‘बरसाने की लाड़ली जी का मंदिर’ और ‘राधारानी महल’ भी कहा जाता है। स्कंद पुराण और गर्ग संहिता के अनुसार इस दिन यानि भाद्रपद महीने के शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को ‘राधारानी महल’ में बरसाने की लाड़ली श्री राधा जी का जन्म का वर्णन किया गया है।
राधा जी का यह प्राचीन मंदिर मध्यकालीन है, जो लाल और पीले पत्थर का बना है करीब ढाई सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर बना है जहां जाने के लिए सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। राधा श्रीकृष्ण की आह्लादिनी शक्ति एवं निकुंजेश्वरी मानी जाती हैं। इसलिए राधा किशोरी के उपासकों का यह अतिप्रिय तीर्थ है।
मंदिर से जुड़ी किंवदंतियां-
लोक मान्यताओं के अनुसार मुगलों द्वारा बरसाना पर आक्रमण के दौरान श्री जी मंदिर में विराजमान लाडली जी के श्री विग्रह को सुरक्षा कारणों के चलते श्योपुर ले जाया गया था। बाद में हालात सामान्य होने पर करीब 8 महीने बाद बरसाना श्री जी मंदिर में पुन: विधि विधान पूर्वक विराजमान किया गया। जिस दौरान जिस विग्रह की श्री जी मंदिर में पूजा की गई ये विजया लाडली कहलाईं।
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स्थानीय लोंगो की मानें तो 1773 में भरतपुर रजवाडे पर मुगल बादशाह शाह आलम ने अपने सेनापति नजफ खान को भेजा। कहा जाता है उन दिनों बरसाना भरतपुर रजवाडे का ही एक अंग था। दोनों सेनाओं के बीच युद्ध हुआ। जिसमें भरतपुर की सेना पीछे हटने को विवश हो गई।
इसकी खबर मिलते ही बरसाना श्री जी मंदिर के सेवायत मंदिर की सुरक्षा को देख राधा रानी के विग्रह को लेकर श्योपुर मध्यप्रदेश चले गए। अगले ही दिन नजफ खान ने बरसाना में प्रवेश किया और यहां करीबन एक हफ्ते तक जमकर लूटपाट की। बताया जाता है बरसाना के लाडलीजी मंदिर में राधा रानी के स्थान पर एक सखी की प्रतिमा को स्थापित कर सेवा पूजा यथावत कर दी गई।
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आज के समय में उस ही स्वरूप को विजय लाडली के नाम से जाना जाता है। हालात सामान्य हो जाने के बाद राधा रानी की मूल प्रतिमा को करीब 8 माह बाद श्योपुर से वापस लाकर बरसाना के मंदिर में विराजमान किया गया था। तब से लेकर आज तक विजय लाडलीजी की प्रतिमा मंदिर के गर्भगृह में ही विराजमान हैं। परंतु इस प्रतिमा के दर्शन किसी को नहीं कराए जाते हैं। इस बार राधारानी 6 सितंबर को ब्रह्म मुहूर्त में सुबह चार बजे प्राकट्य हुआ। इस पल का साक्षी बनने को देश-दुनिया के लाखों श्रद्धालु बरसाना पहुंचे हैं।
सबसे पहले मोर को खिलाते हैं भोग
लाड़ली जी के मंदिर में राधाष्टमी का त्योहार धूमधाम से मनाया जाता है। यह त्योहार भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। राधाष्टमी का पर्व जन्माष्टमी के 15 दिन बाद भाद्रपद माह की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। राधाष्टमी पर्व बरसाना वासियों के राधा रानी को लड्डुओं और छप्पन प्रकार के व्यंजनों का भोग का लगाते हैं मगर पहले उस भोग को मोर को खिलाया जाता है। इससे जुड़ी मान्यता के अनुसार मोर को राधा-कृष्ण का स्वरूप माना जाता है। इसलिए पहले उन्हें भोग लगाया जाता है।
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