बीजेपी को बैकफायर करेगी ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ और ‘आप-दा’!

Edited By Rahul Singh,Updated: 04 Jan, 2025 04:13 PM

jahan jhuggie wahin makaan and aap da will backfire on bjp

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में चुनाव प्रचार का शंखनाद ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ के नारे से जरूर करना चाहा, लेकिन वास्तव में उन्होंने अपने चुनावी अभियान का श्रीगणेश आम आदमी पार्टी की सरकार को ‘आप-दा सरकार’ बताकर किया है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली में चुनाव प्रचार का शंखनाद ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ के नारे से जरूर करना चाहा, लेकिन वास्तव में उन्होंने अपने चुनावी अभियान का श्रीगणेश आम आदमी पार्टी की सरकार को ‘आप-दा सरकार’ बताकर किया है। जो बात पॉजिटिव होनी चाहिए थी, उपलब्धि के तौर पर जिसका डंका पीटा जाना चाहिए था, जिस पर मोदी सरकार को नाज(!) होना चाहिए था उसका नगाड़ा पीटने के दौरान छाती पीटने वाली रुदाली क्यों? दरअसल ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ और ‘आप-दा’ दोनों ही बीजेपी को बैकफायर कर सकती है। 

बात 2 नवंबर 2022 की है। तब 22 दिसंबर को एमसीडी चुनाव होने में 50 दिन बाकी थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कालकाजी में 3024 ईडब्ल्यूएस आवासों का उद्घाटन करते हुए लाभार्थियों को घर की चाबी सौंपी थी। प्रधानमंत्री ने बड़े सपने दिखाए थे, “वर्षों से जो परिवार दिल्ली की झुग्गियों में रह रहे थे आज उनके लिए एक प्रकार से उनके जीवन की नई शुरुआत होने जा रही है।” लेकिन, हुआ क्या? दिल्ली में 15 साल बाद एमसीडी का चुनाव बीजेपी हार गयी। ऐसा क्यों हुआ? इसे समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है।


महंगी पड़ती है चुनाव से पहले मकान की चाबी
एमसीडी चुनाव से पहले 3024 और विधानसभा चुनाव से पहले 1675 मकान ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ का नारा बुलंद करते हुए दिए गये हैं। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी में रहने वालों की संख्या कितनी है?- तकरीबन 20 लाख। झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या 4 लाख है। बीते दस साल में 4700 झुग्गियां भी मकान में नहीं बदल सकी हैं तो ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ के नारे पर नेता स्वयं झूम सकते हैं, उनका साथ देते हुए झुग्गीवासी नहीं झूमेंगे। जो प्रतिक्रिया एमसीडी चुनाव के दौरान हुई थी और ‘जहां झुग्गी वहीं मकान’ का नारा बैकफायर किया था, वही प्रतिक्रिया मतदाता दोबारा देंगे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स करते हुए सवाल उठाया कि प्रधानमंत्री ने तो 2022 तक सभी को पक्का मकान देने का वादा किया था। जाहिर है कि ये सवाल उन सभी झुग्गीवालों के लिए भावनात्मक हो जाता है जिन्हें मकान नहीं मिले हैं। यानी 4700 लोग तो खुश हो सकते हैं लेकिन 20 लाख लोगों में ज्यादातर लोगों के लिए पीएम की घोषणा उनके जख्म हरे करने वाले हैं। इसलिए यह मुद्दा बीजेपी को सियासी फायदे के बजाए नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है।


दिल्ली में सरकार का मतलब ‘एलजी’
यह अकारण कतई नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कवर अप करने के लिए एक बैक अप नारा दिया- ‘आप-दा सरकार’। इसका मकसद चर्चा का केंद्र बिन्दु बदलना था। मगर, अरविन्द केजरीवाल ने सूद समेत तत्काल इस नारे को लौटा भी दिया, “आपदा दिल्ली में नहीं बीजेपी में आयी है..बीजेपी के पास न तो सीएम फेस है और न ही एजेंडा। हमने दिल्ली में इतने काम किए हैं कि घंटों तक गिना सकते हैं। अपने 39 मिनट के भाषण में वे कोई काम नहीं गिना पाए।”

दिल्ली में ‘सरकार’ का मतलब क्या है?  जीएनसीटीडी एक्ट 1991 में हुए दो संशोधनों- 2021 और 2023 में- के बाद अब दिल्ली में सरकार का मतलब है- एलजी यानी उपराज्यपाल। इन संशोधनों में यह सुनिश्चित किया गया था-“राज्य की विधानसभा द्वारा बनाए गये किसी भी कानून में सरकार का मतलब उपराज्यपाल होगा।” जाहिर है कि बगैर एलजी के एप्रूवल के कोई काम दिल्ली में नहीं हो सकता। ये दोनों संशोधन सुप्रीम कोर्ट के फैसले के पहले और बाद में किए गये जिसमें कहा गया था कि अगर चुनी हुई सरकार के पास प्रशासनिक व्यवस्था का अधिकार नहीं होगा तो फिर ट्रिपल चैन जवाबदेही पूरी नहीं होगी। उपराज्यपाल को सरकार की सलाह माननी होगी। पुलिस, पब्लिक ऑर्डर और लैंड का अधिकार केंद्र के पास रहेगा। सुप्रीम कोर्ट का फैसला अरविन्द केजरीवाल सरकार की वैधानिक जीत थी जिसे विधायी ताकत के दम पर मोदी सरकार ने पलट दिया था। 3 सितंबर 2024 को राष्ट्रपति ने असाधारण नोटिफिकेशन जारी करते हुए दिल्ली के एलजी की शक्तियां बढ़ा दीं। अथॉरिटी, बोर्ड, कमीशन या वैधानिक निकायों का गठन करने का अधिकार अब एलजी के पास आ गया। 

‘अन्ना’ ने केजरीवाल को सत्ता दिलाई तो खुद नरेंद्र मोदी को भी
जब दिल्ली में ‘सरकार’ का मतलब एलजी है तो ‘आप-दा सरकार’ का मतलब भी सवालों के घेरे में आ जाता है।  जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अन्ना हजारे का जिक्र करते हुए भी आम आदमी पार्टी पर हमला बोला तो कहीं न कहीं उन्होंने आरएसएस और बीजेपी को भी लपेटे में ले लिया। वजह साफ है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के दिल्ली में दो सत्ता बदली थी- एक अरविन्द केजरीवाल ने शीला दीक्षित को गद्दी से उतारा था तो दूसरा स्वयं नरेंद्र मोदी ने डॉ मनमोहन सिंह की जगह ली थी। अब नरेंद्र मोदी के भाषण के उस अंश पर गौर करें जिसमें उन्होंने ‘कट्टर बेईमान’ बोलते हुए हमला तो ‘आप’ पर किया लेकिन स्वयं उसकी जद में आ गये, “अन्ना हजारे जी को सामने करके कुछ कट्टर बेईमान लोगों ने दिल्ली को आपदा मे धकेल दिया।“

आयुष्मान और यमुना के मुद्दे भी बैकफायर करेंगे
प्रधानमंत्री नरेंद्री मोदी की ओर से आयुष्मान योजना लागू नहीं होने देने की बात भी उल्टी पड़ सकती है। आम आदमी पार्टी ने पहले से ही दिल्ली में इलाज को फ्री कर रखा है। हाल में संजीवनी योजना भी शुरू की गयी है, जिसमें 60 साल से ऊपर के सभी बुजुर्गों का अनलिमिटेड इलाज सरकार या गैर सरकारी किसी भी अस्पताल में उनकी इच्छा के विरुद्ध हो सकेगा। आयुष्मान योजना सिर्फ गरीब तबके के लोगों के लिए है और वह भी 5 लाख रुपये तक का इलाज ही उपलब्ध कराती है। 

प्रधानमंत्री ने यमुना नदी में प्रदूषण का मुद्दा भी उठाया। मगर, न तो यमुना में प्रदूषण सिर्फ दिल्ली वालों के कारण है और न ही अकेले दिल्ली सरकार से यह प्रदूषण दूर हो सकता है। यमुना का मुद्दा उठाते ही गंगा सफाई अभियान की याद भी आ जाती है। नमामि गंगे नाम से 2014 से शुरू हुए गंगा सफाई अभियान मे 13 हजार करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं लेकिन गंगा की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। जाहिर है कि यह मुद्दा आम आदमी पार्टी की सरकार से जितना जुड़ा है उससे ज्यादा स्वयं नरेंद्र मोदी की ओर उंगली उठाता दिखता है। 

‘शीश महल’ पर केजरीवाल ने पीएम को आईना दिखाया
प्रधानमंत्री ने बिना नाम लिए अरविन्द केजरीवाल पर ‘शीशमहल’ वाला हमला भी बोला, “मैं भी कोई शीश महल बना सकता था, लेकिन मेरा सपना था कि देशवासियों को पक्का घर मिले। देश जानता है कि मोदी ने कभी अपने लिए घर नहीं बनाया।” इस आरोप का तत्काल जवाब अरविन्द केजरीवाल ने दिया। उन्होंने कहा कि शीश महल की बात उस व्यक्ति के मुंह से उचित नहीं लगता जिसने अपने लिए 2700 करोड़ रुपये का घर बनाया है, 8400 करोड़ रुपये के प्लेन में घूमता रहा है और 10 लाख का सूट पहनता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नकारात्मक हमलों से दिल्ली चुनाव में अपने पहले ही भाषण में बीजेपी को मुश्किल में डाल दिया है। उन्होंने अपने स्पर्धी राजनीतिक दलों को मौका दिया है कि वे उन्हें आईना दिखाने का काम करें। प्रधानमंत्री ऐसा कुछ भी नहीं बता सके जिससे दिल्ली की जनता को लगे कि बीजेपी के सत्ता में आने से उन्हें कोई फायदा या सहूलियत मिलने वाली है। वहीं, आम आदमी पार्टी लगातार बचत, फायदा और सहूलियत को केंद्रीय मुद्दा बनाए हुए है।

प्रेम कुमार, वरिष्ठ पत्रकार व टीवी पैनलिस्ट

Disclaimer : यह लेखक के अपने निजी विचार हैं।

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