दिल्ली में प्रदूषण से निपटने के लिए 'fake clouds' से 'Real rain', cloud seeding तकनीक का उपयोग, जानिए खर्च और चुनौतियां

Edited By Mahima,Updated: 19 Nov, 2024 03:08 PM

pollution in delhi use of cloud seeding technology to generate  real rain

दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए 'आर्टिफिशियल रेन' या 'क्लाउड सीडिंग' तकनीक अपनाने की योजना है, जिसमें बादलों में सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायन डाले जाते हैं ताकि बारिश हो सके। हालांकि, यह तकनीक अस्थायी समाधान है और प्रदूषण को स्थायी रूप से कम नहीं कर...

नेशनल डेस्क: दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के बीच राज्य सरकार ने एक नई योजना की घोषणा की है, जिसका उद्देश्य प्रदूषण को कम करने के लिए असली बारिश का निर्माण करना है। इस प्रक्रिया को 'cloud seeding' या 'Artificial Rain' कहा जाता है। इस तकनीक के तहत बादलों में रसायन डाले जाते हैं, ताकि वे बारिश पैदा कर सकें। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को इस तकनीक को अपनाने के लिए पत्र लिखकर अनुमति मांगी है। उनका कहना है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण इस समय 'गंभीर श्रेणी' में पहुंच चुका है और इसे कम करने के लिए आर्टिफिशियल बारिश की आवश्यकता है। 

क्या है Artificial Rain?
Artificial Rain, जिसे cloud seeding भी कहा जाता है, एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें आर्टिफिशियल तरीके से बादलों को बारिश के लिए प्रेरित किया जाता है। इसके लिए वैज्ञानिकों द्वारा बादलों में सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस या साधारण नमक जैसे रसायन डाले जाते हैं। इन रसायनों को विमान, बैलून, रॉकेट या ड्रोन की मदद से बादलों तक पहुंचाया जाता है। जब इन रसायनों का बादलों में मिलाव होता है, तो बादलों में मौजूद पानी के कण ठंडे होकर जमने लगते हैं, और इसके परिणामस्वरूप बारिश होती है। हालांकि, Artificial Rain के लिए कुछ शर्तें जरूरी हैं। सबसे पहली शर्त यह है कि आसमान में कम से कम 40% बादल होने चाहिए। इसके अलावा, हवा की दिशा और गति का भी सही होना आवश्यक है। अगर इन शर्तों में कोई भी कमी हो, तो इस तकनीक का असर नहीं होगा और यह बेकार हो सकती है।

cloud seeding के लिए क्या जरूरी है?
cloud seeding के लिए बादलों में पर्याप्त पानी और नमी का होना बेहद जरूरी है। अगर बादल सूखे हैं या मौसम बहुत अधिक शुष्क है, तो cloud seeding काम नहीं कर सकती। इस प्रक्रिया के लिए, वैज्ञानिक बादलों में सिल्वर आयोडाइड, ड्राई आइस या नमक का छिड़काव करते हैं, जिससे बादलों के भीतर पानी के कण जमा हो जाते हैं और वे बारिश में बदल जाते हैं। सर्दियों के दौरान बादलों में पानी की कमी हो सकती है, और इस कारण से बारिश की संभावना कम हो जाती है। इसके अलावा, अगर बादलों में पानी पर्याप्त नहीं है तो जमीन पर बारिश की बूंदें गिरने से पहले ही भाप बन सकती हैं, और इस प्रकार बारिश नहीं हो पाती।

क्या प्रदूषण कम होगा?
अब तक, यह साबित नहीं हो पाया है कि आर्टिफिशियल बारिश से प्रदूषण में कमी आती है या नहीं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, cloud seeding एक स्थायी समाधान नहीं है और इसका असर सिर्फ कुछ दिनों तक ही रहता है। यह प्रक्रिया प्रदूषण को कुछ हद तक कम कर सकती है, लेकिन यह उसका स्थाई इलाज नहीं है। इस तकनीक से एक बार में 4-5 या 10 दिनों के लिए ही प्रदूषण में कमी देखने को मिल सकती है। हालांकि, इसका एक बड़ा खतरा यह भी है कि अगर अचानक तेज हवा चलने लगे तो रसायन किसी अन्य जगह पर गिर सकते हैं, जिससे पूरी योजना व्यर्थ हो सकती है। उदाहरण के लिए, यदि दिल्ली के बजाय मेरठ में बारिश हो गई तो यह प्रयास असफल हो जाएगा। इसलिए सही समय, बादल और हवा की दिशा का अनुमान सही तरीके से लगाना जरूरी है।

cloud seeding की लागत क्या होगी?
cloud seeding की प्रक्रिया में काफी खर्च आता है। दिल्ली में अगर इस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है, तो इसका खर्च लगभग 10 से 15 लाख रुपये के आसपास होगा। इस राशि में विमान या अन्य यांत्रिक उपकरणों के संचालन की लागत, रसायनों की कीमत और अन्य तकनीकी खर्चे शामिल हैं। हालांकि, यह लागत एक बार की प्रक्रिया के लिए होती है और अगर इसे बार-बार करना पड़े तो खर्च भी बढ़ सकता है।

क्या दिल्ली में पहले भी Artificial Rain का प्रयास किया गया है?
दिल्ली में इससे पहले 2019 में भी आर्टिफिशियल बारिश की योजना बनाई गई थी, लेकिन बादलों की कमी और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) से अनुमति प्राप्त न होने के कारण वह योजना टल गई थी। इसके अलावा, पिछले साल यानी 2023 में भी दिल्ली सरकार ने 20 और 21 नवंबर को आर्टिफिशियल बारिश की योजना बनाई थी, लेकिन तकनीकी कारणों से यह कार्य सफल नहीं हो पाया था। 

cloud seeding का इतिहास और अन्य देशों में प्रयोग
cloud seeding का प्रयोग दुनिया के 53 देशों में किया जा चुका है। इस प्रक्रिया का इस्तेमाल ज्यादातर सूखा, बर्फबारी या अत्यधिक बारिश के नियंत्रण के लिए किया जाता है। उदाहरण के लिए, चीन, संयुक्त राज्य अमेरिका और सऊदी अरब जैसे देशों में इसे सफलतापूर्वक लागू किया गया है। हालांकि, हर जगह इस तकनीक के परिणाम अलग-अलग रहे हैं, और कहीं-कहीं यह पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया है। 

क्या यह तकनीक दिल्ली के प्रदूषण समस्या का हल हो सकती है?
cloud seeding के माध्यम से प्रदूषण कम करना एक अस्थायी उपाय हो सकता है, लेकिन यह दिल्ली के प्रदूषण की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। प्रदूषण के प्रमुख कारणों में निर्माण कार्य, वाहनों से होने वाला धुआं, पराली जलाना और उद्योगों का धुंआ शामिल हैं। इन समस्याओं का समाधान करने के लिए सरकार को दीर्घकालिक उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा, जैसे कि हरित ऊर्जा, बेहतर पब्लिक ट्रांसपोर्ट, और प्रदूषण नियंत्रण के कड़े उपाय। cloud seeding तकनीक प्रदूषण को कुछ समय के लिए कम कर सकती है, लेकिन यह एक स्थायी समाधान नहीं है। दिल्ली में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसके अलावा, Artificial Rain के परिणाम हमेशा अनुमानित नहीं होते, और इसमें कई चुनौतियां भी हैं। अगर यह तकनीक सफल होती है तो इससे कुछ दिनों के लिए राहत मिल सकती है, लेकिन प्रदूषण को स्थायी रूप से खत्म करने के लिए अन्य उपायों को प्राथमिकता देनी होगी।

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