Edited By Mahima,Updated: 27 Feb, 2025 11:56 AM
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गुजरात के अहमदाबाद के दीपक परमार 2002 के दंगों के दौरान गोली लगने से घायल हुए थे। 23 साल बाद भी उनके शरीर में उस गोली का दर्द बना हुआ है। प्रशासनिक गलती के कारण उनका नाम गलत दर्ज हुआ, जिससे उन्हें आरोपी बना दिया गया। अब वह दैनिक मजदूरी से जीवन यापन...
नेशनल डेस्क: गुजरात के अहमदाबाद के ओधव इलाके में रहने वाले 45 वर्षीय दीपक परमार पिछले 23 सालों से एक ऐसी गोली के दर्द को झेल रहे हैं, जिसने न सिर्फ उनके शरीर में जख्म दिया, बल्कि उनका भविष्य भी छीन लिया। 2002 के दंगों के दौरान उनके शरीर में लगी यह गोली आज भी उनकी जिंदगी में टीस बनकर बनी हुई है।
"1 मार्च 2002 की वह काली रात..."
दीपक परमार बताते हैं, "मैं काम से लौट रहा था, तभी अचानक मेरी पीठ में कुछ गर्म सा महसूस हुआ। ऐसा लगा जैसे किसी ने जलती हुई लोहे की छड़ घुसा दी हो। मैं वहीं गिर पड़ा, खून से लथपथ, और फिर मेरी चेतना खो गई।" आज 23 साल बीत चुके हैं, लेकिन वह घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरा। उनके शरीर से समय-समय पर खून, मवाद और तरल पदार्थ निकलता रहता है। इस शारीरिक पीड़ा के अलावा उनकी जिंदगी में पहचान की चोरी, न्याय से वंचित रहने और छिन गए अवसरों की एक अलग ही कहानी है।
गलत नाम से दर्ज हुआ रिकॉर्ड, बढ़ गई मुसीबतें
दीपक परमार, जिनका असली नाम दशरथ परमार था, 22 साल की उम्र में दंगों के दौरान घायल हुए थे। जब उन्हें अचेत अवस्था में शारदाबेन अस्पताल ले जाया गया, तो प्रशासनिक गलती के चलते उनका नाम "दीपक" दर्ज हो गया। यह गलती आगे चलकर उनकी परेशानियों की जड़ बन गई।
जब पीड़ित को ही बना दिया आरोपी
इस घटना के बाद परमार को आरोपी बना दिया गया। वह तीन साल तक बिस्तर पर पड़े रहे और साथ ही उन पर लगे झूठे आरोपों से भी लड़ते रहे। जब वह कुछ हद तक स्वस्थ हुए, तो एक एनजीओ ने उनकी मदद की और उन्होंने 'गोधराकांड पान पार्लर' नाम की एक छोटी सी दुकान शुरू की।
आज भी संघर्ष जारी
आज भी दीपक परमार किसी स्थायी नौकरी के बिना, दैनिक मजदूरी के सहारे अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं। न तो उन्हें कोई सरकारी मदद मिली, न ही उनकी पीड़ा को सही मायनों में कोई समझ सका। "आज भी हर रोज उस दिन को याद करके कांप उठता हूं। गोली का घाव तो दिखता है, लेकिन जो जख्म अंदर लगा है, वह कोई नहीं देख सकता।" – दीपक परमार